Elam

Elam
ऐलम

(1)
सुनियो साधू सन्त सुजान, सतगुरू दीना सच्चा ज्ञान।
हक पहचान नेकी गहे. सोई साधू संचा सरे में रहे।
वदी बेपीर काहें काम, सरे में होयगो बेरान।
गरब गुमान ना करना अति निहाय तिहे मरना।
जोरी जुलम ना करिये, सिरजन से डरिये।
इस विधि चेति रे वैकूप, मिलसी खाक में रंगरूप।
भाई बन्धु जमगल फंद, सारा जगत देखा अन्ध।
ले सतनाम तज सब और मूरख जाइगौ किस ठौर।
मेह मद और रसूल मेहमद रहे परदे भूलि।
नौ नाथ चैरासी सिद्ध, वे भी भरमिये वे बुद्धि।
राजा चक्र से मंडलीक, वे भी गये जम में बीत।
बामन वीर नौ औतार, वे भी मार खाये काल।
रावण असुर कहियो डीठ, काटे बीस भुजा दश शीश।
नर से नारद मुनि नारी कियौ विसन चलाय पल्ले दिया।
नौ छोहन दल भोगना हारे गर्व जर जोधना।
के ते जोघा भये बाना बली, पांडु जाय हिवारे गरे।
के ते शेख मुल्ला पीर, वे भी गये औघट नीर।
विप्र वेद अति भंते, वे भी गये सिर धुनते।
राजा रानी बादशाही वे भी चले जनम गदॉय।
रूखा विरखा नदी और नाव, जायेंगे समद और तालाब।
जायेंगे तीनों लोक नौऊ खंड, आगे उठसी स्योमंड।
रहसी आप अवगत एक. जाकी सरन पकरी टेक।
सांचे गुरु हैं सबलदास, सामल कही सुनाय।
भगत को विरद न लाजै।

(2)
सतगुरु पिता भगति है माता।
भाई भाव कौ मिलवौ, मान पाइये सौदा।
दुनी देखिया है धुंध, जगमल गेरिया है फन्द।
हिन्दू गया रस बरत करे, सो दिन रात भूखा मरे।
तुरका रहे राजा तीस, उनहू न पाये जगदीश।
काजी पढ़े, कायम कुरान, उस अल्ला कूँ पहचान।
कुरंदा कहे सबका, तूने दो कर क्यों देखा।
काजी हाथ लेये खड़ग, जीव कूं मारते बेदरद।
ये तो काया काफर करे, काजी होय झूठा सरे।
काजी करत हो तदवीर, तुम कूं नाहि मिला पीर।
पीर पीर मुर्शद लैहे तमसी दाहिनी जोल है।
मुसलमान कहिये सोय, महर निभाव दिल में होय।
कलमा पाक लौ लावै, रोजी मिस्त की पावै।
येता काम करै काजी, अल्ला जब रहे राजी।
हिन्दू सांचला जब होय, सारो कपट डारे धोय।
पांडे पढ़े गीता पाठ, अवगत आप छै अग्गाज।
ब्रह्मा वेद पठियो चार, जामें भरमियो संसार।
जिन्ने नांहि जाना वेद, जाकू आन मिलियौ देव।
कोई आनि धर्म करै कारज एक नाही सरे।
मारे काल करे वेरान, कोठे गऊ और कोठे दान।
मूंड मुड़ाय पहरा भेष, खुद खाया सारा देश।
जिन सतनाम ना लिया हवालें जम के कर दीया।
कांचा पिंडरे भाई, विगसी पलक में जाई।
देख्या दुनी का सा झूल, जैसे बाग फूल्या फूल।
फूला फुलवी कुमिलाय, जैसे दुनी आवे जाय।
दुनी चाली बाजी हारि, साध सबद लेड विचारि।
झूठ भरम भाजि चल्यौ, महर सबलदास जी की भई।
सामल साध सुनाय, संगत में ऐसे कही।

(3)
सांचे गुरु हैं सबलदास, सांच के हिरदे आवें।
परखि न जाने पोत, कहा हीरा कूँ जाने।
छीलर गोता खाय समद की थाह न पावें।
कंकड लियौ उठाय कहा पारस कूं जानें।
डरें स्यार को देख, सिंह पै कैसे धावें।
करे और की आस, मन दातार कहावें।
मेंटे कुल मरजाद, सूर सामंत कहावें।
परखें गुरु को शब्द, अन्धेरी ना रहे।
अंधियारो मिट जाय, ज्योति सूरज परगासे।
कर्री नजर गुरुन की, निहकलंक चढ़सी आय।
चैकी बैठे सत की, जहाँ रहन न पावै पाप।
यह औसर मत चूंकियो साधों, सुनौ सबद चित लाय।
सांचे गुरु हैं सबलदास, सामल कही सुनाय।
भगत को विरद न लाजै।

(4)
गुरग बान को खरगवान, धीरज धन कसत सील वानि सादि रे।
हिम्मत कटारी हाथ जरै है विवेक रे मारिले कुबुद्धि ने भरोसो एक राखियो।
तन को लाली छोड़ मन कोट है कपट की जैसे बालू भीति और जैसा ख्याल घट को।
जीते जूआ हारिये तो मन ही की धारना, मोह जन जा रहे जगत रूपी काल है।
कोई राजा कोई रंक आयेंगे इंसाफ कूं उबरंगौ साद सोई कहे साद सत सत की आवाज है।
साध कान की जियो, आनि धर्म छांडि, सतनाम तुम लीजिये।
हेलो दिये कहे साध सामल सतगुरु हैं सबल दास तुम अन्दर ये ही आनिये।

(5)
सेत तखत जगमगै दिये जहाँ नूर अधिक्का,
सतगुरु अवगत वैठि जहाँ ते सबका लेखा।
सरे माहि अदल बोलिबा कोई ना पावै,
सम सम की लिखी काड़ सतगुरू दिखलावे।
सवका दीया हाथ घना देखें पछितायें,
जब कछु नाहि होय जुग चैथे ही पावें,।
भरम, की स्याही महर कमाई,
जिनपे गुरु की महर जिनै वे भृष्ट बतायें।
कर्री नजर गुरुन की निहकलंक चढ़सी आप,
चैकी बैठोसत की जहाँ रह न पावे पाप।
यह औसर मत चूकियो साधौ, सुनौ शब्द चित लाय।
सांचे गुरु हैं सबलदास सामल
कही सुनाय भगत को विरध न लाजै।

(6)
अबहू चेत समझ मन मेरा या औसर में भली बनी।
झूठे जगत भरम सूँ लाग्यो, सच्चा सुमरो एक धनी।
गढ़े पत्थर कूँ पूजे भोंदू दई देवता मान लिया।
तीरथ बरत पचे पेदायस, हिरदे भीतर सांच नहीं।
सेंस भरम को परयो सांकरो, झूठ बोलते अवधि गई।
पांडे वेद सबै पचिहारे, लेबेई की घात करी।
तुरक पीर पैगम्बर पूजे, गला काट तसमीन लई ।
बेइमान बेखुन करि डारौ झूठे मुल्ला बाँग दई।
छैः दर्शन पाखण्ड छियानवै, भगति इनसे न्यारी रही,
सबलदास गुरु पूरा मिलियो, सामल साध बिचारि कही।